अयोध्या धामउत्तर प्रदेश

राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने UGC 2026 कानून का किया समर्थन

राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने UGC 2026 कानून का किया समर्थन
अयोध्या धाम
राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने यूजीसी 2026 कानून को लेकर चल रही बहस के बीच बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वर्ष 2026 में लागू किया गया यूजीसी का कानून विरोध का विषय नहीं है, बल्कि इसे विवेक और बुद्धि के साथ समझने की आवश्यकता है। यह कानून किसी भी प्रकार का विरोधाभास नहीं, बल्कि सनातन धर्म की मूल आत्मा—मानवता और मानवीय गरिमा—से जुड़ा हुआ कदम है।
राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने कहा कि आज देश में उच्च शिक्षा संस्थानों को लेकर समानता, सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यूजीसी द्वारा बनाए गए नए नियमों पर चर्चा हो रही है। कहीं इसे आशा, कहीं भय और कहीं भ्रम की दृष्टि से देखा जा रहा है, लेकिन किसी भी कानून को केवल समर्थन या विरोध के दायरे में बाँधना उचित नहीं है। आवश्यक है कि उसे तथ्यों, समझ और विवेक के साथ परखा जाए।
उन्होंने कहा कि केवल कानून बदलने से समाज नहीं बदलता। कानून व्यवस्था तो बना सकता है, लेकिन संवेदना नहीं जगा सकता। संवेदना विचार से आती है और विचार चेतना से। यदि कानून ही अंतिम समाधान होते, तो आज भी समाज को जाति और भेदभाव जैसे मुद्दों से जूझना नहीं पड़ता। समस्या कानून में नहीं, बल्कि हमारी सोच और दृष्टि में है।
राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने कहा कि यूजीसी 2026 के नियमों का उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में अपमान, भेदभाव और असुरक्षा को समाप्त करना है, जो पूरी तरह मानवीय और संवैधानिक है। लेकिन जब इन्हें भय और अफवाहों के चश्मे से देखा जाता है, तो समाज में संदेह पैदा होता है। इन नियमों को अफवाहों से नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर समझा जाना चाहिए।
सनातन धर्म का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इसकी मूल आत्मा मानवता है, न कि जन्म आधारित ऊँच-नीच। यदि जन्म ही श्रेष्ठता का आधार होता, तो संत रविदास, संत कबीर, महर्षि वाल्मीकि, शबरी और महर्षि वेदव्यास जैसे महापुरुष सनातन परंपरा में सर्वोच्च स्थान कैसे प्राप्त करते। सनातन परंपरा में सम्मान जन्म से नहीं, बल्कि गुण, कर्म और ज्ञान से तय हुआ है।
अंत में राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने कहा कि आवश्यकता किसी नए विभाजन की नहीं, बल्कि चेतना की जागृति की है। सरकार नियम बनाती है ताकि समाज में सुरक्षा और संतुलन बना रहे, लेकिन समाज का दायित्व है कि वह विचारों में बदलाव लाए। यूजीसी 2026 जैसे कानूनों को विरोध की नहीं, विवेक की दृष्टि से देखा जाना चाहिए, क्योंकि समाधान संघर्ष में नहीं, आत्ममंथन में है—कानून नहीं, विचार बदलने की ज़रूरत है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!