अयोध्या धामउत्तर प्रदेश

हिंदू इसलिए संकट में है क्योंकि वह भीतर से बँटा हुआ है : महंत श्री राजू दास जी महाराज 

हिंदू इसलिए संकट में है क्योंकि वह भीतर से बँटा हुआ है : महंत श्री राजू दास जी महाराज
अयोध्या धाम
सोए हुए एससी, एसटी, ओबीसी और जनरल समाज के लोगों, ज़रा कश्मीर और लखनऊ की सड़कों को देखो और सोचो और विचार करो|
सवाल जागरूकता का है, प्राथमिकताओं का है, और अपनी अस्मिता को समझने का है।
जब दूर किसी देश में, किसी मज़हबी पहचान के नाम पर कोई घटना होती है, तो लोग अपनी पहचान के लिए सड़कों पर उतर आते हैं। उन्हें अपने दीन, अपनी उम्मत, अपनी मजहबी एकजुटता की चिंता है। यह उनका अधिकार है।
लेकिन हम?
हम अपने ही देश में, अपने ही समाज के भीतर होने वाली घटनाओं पर कितनी बार एकजुट होकर खड़े होते हैं?
Kashmir में जब धर्म पूछकर गोलियां चलीं, जब निर्दोष लोगों को उनकी पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया, तब पूरे देश में वैसी सामूहिक बेचैनी क्यों नहीं दिखी?
यही वो लोग थे जब पहलगाम हुआ अब हंस रहे थे और इनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी लेकिन आज ईरान के जो हुआ उसके चक्कर में यहां अपने देश में आगजनी और सरकारी सम्पति से लेकर लोगों की सम्पत्ति को तोड़ दिया गया।।
जब अपने ही पड़ोस में कोई अन्याय का शिकार होता है, तब हम जाति, क्षेत्र, राजनीति और छोटे-छोटे स्वार्थों में बँटकर चुप क्यों हो जाते हैं?
Lucknow की सड़कों पर जो भीड़ उतरती है, वह एक संदेश देती है—पहचान के लिए एकजुटता। सवाल यह है कि क्या बहुसंख्य समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान, अपने सामाजिक प्रश्नों और अपने राष्ट्रीय सरोकारों पर भी वैसी ही एकता दिखा पाता है?
वो पहलगाम हो, कश्मीरी पंडितों का विस्थापन हो ,बंगाल हो केरल हो महाराष्ट्र हो या फिर कन्हैयालाल,कमलेश तिवारी को सरेआम काट दिया गया हो – ऐसा नहीं कि तुम इसकी गिरफ्त में नहीं आओगे – एक दिन सेकुलरिज्म तुम्हारा तुम्हे ही निगल लेगा और कोई संघी भक्त हो या फिर ये सब समझने वाला तुम्हारा साथ न देगा क्योंकि ये तुम्हारी अपनी चॉइस है सेकुलर रहने की।।
हिंदू इसलिए ख़तरे में नहीं कि कोई उसे मिटा देगा। हिंदू इसलिए संकट में है क्योंकि वह भीतर से बँटा हुआ है—जातियों में, उपजातियों में, राजनीतिक झंडों में, आपसी अविश्वास में। असली चुनौती बाहर से कम, भीतर से अधिक है। जब तक एससी, एसटी, ओबीसी और तथाकथित जनरल एक साझा सांस्कृतिक चेतना में स्वयं को नहीं देखेंगे, तब तक संख्या होने के बावजूद शक्ति नहीं बन पाएंगे।
अगर ऐसा ही रहा तो जोगिंदर नाथ मंडल से लेकर कश्मीर में ३७० के समय गैर मुस्लिमों के साथ क्या हुआ किसी से छिपा नहीं है – नालिया साफ करने से ज्यादा तुम्हारी औकात न थी – आज उसी धर्म को गिरया रहे है ऐसे cye लोग।।
आज जरूरत किसी के खिलाफ खड़े होने की नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने की है। क्या हम अपने ही समाज के दर्द पर संवेदनशील हैं?
क्या हम उस मजहबी पहचान के तौर तरीकों और उसकी वास्तविकता से अवगत है – क्या दीन, उम्माह,काफिर, दारुल , गजवा आदि की हमें जानकारी है ?
क्या इस्लाम की उस वास्तविकता को हम जानते है कि क्यों ईरान से लेकर पाकिस्तान बंगलादेश तक हमने खो दिए ??
क्या हम अपने धर्म के मुद्दों पर वैसी ही तत्परता दिखाते हैं जैसी दूसरे अपनी मजहबी पहचान के प्रश्न पर दिखाते हैं?
आज तुम सो बार SC ST, OBC, स्वर्ण या कुछ भी बनो लेकिन उस वास्तविकता का थोड़ा ज्ञान जरूर लो जो तुम्हारी आनेवाली पीढ़ियों को बर्बाद कर देगी – कही जोगिंदर नाथ मंडल से लेकर कश्मीरी पंडितों की तरह धोखे में न रहो ।।
समय आ गया है कि हम जातिगत दीवारों से ऊपर उठकर सोचें। यदि हम अपनी अस्मिता, अपने इतिहास, अपने सांस्कृतिक मूल्यों को भूलते रहेंगे, तो संकट बाहर से नहीं, भीतर से पैदा होगा। एकता बिना आत्मबोध के संभव नहीं है।
सीख किसी से भी ली जा सकती है—पर दिशा अपनी होनी चाहिए, और प्राथमिकता अपने समाज और अपने राष्ट्र की।

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