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वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ भव्य शोभायात्रा एवं देवाराधन पूर्वक श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ

वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ भव्य शोभायात्रा एवं देवाराधन पूर्वक श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ
अयोध्या
पूराबाजार क्षेत्र के राजेपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण, भव्य शोभायात्रा और देवआराधन के साथ श्रद्धा एवं भक्ति के वातावरण में हुआ। शोभायात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और पूरे क्षेत्र में भक्ति का माहौल देखने को मिला।
कथा के द्वितीय सत्र में प्रवचन करते हुए आचार्य ज्ञान चंद्र द्विवेदी ने कहा कि पुराण भारतीय जीवन साहित्य के अमूल्य रत्न हैं और अतीत को वर्तमान से जोड़ने वाली स्वर्णमयी श्रृंखला के समान हैं। उन्होंने कहा कि भगवान की कथा मनुष्य के हृदय में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का संचार करती है। आचार्य द्विवेदी ने कहा कि भगवान की कथा स्वयं भगवान से भी अधिक उदार मानी गई है, क्योंकि इसके श्रवण मात्र से पापी से पापी व्यक्ति भी मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि धुंधुकारी जैसा उग्र पापी भी भगवत्कथा के प्रभाव से भगवान के धाम का अधिकारी बन गया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण सच्चिदानंद स्वरूप हैं और कृष्ण का अर्थ ही परम आनंद है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति आनंद की खोज में लगा हुआ है, लेकिन वास्तविक आनंद किस प्रकार प्राप्त किया जाए, यह अधिकांश लोग नहीं जानते। भौतिकतावादी दृष्टिकोण से जीवन जीने पर मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूरा करने के प्रयास में निराशा का सामना करता है। आचार्य ने कहा कि दिव्य आनंद की प्राप्ति के लिए मनुष्य को अपने जीवन दर्शन को समझना होगा और उसे समझने का सबसे सरल माध्यम भगवान की कथा है। ज्ञान और भक्ति दोनों ही अंतरंग भाव हैं, जो अंत:करण में निवास करने वाले परमात्मा का साक्षात स्पर्श कराते हैं। शास्त्रों के अनुसार इंद्रियों से परे मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से भी परे परमात्मा का स्थान है। उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत के महात्म्य में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भगवत्कथा मनुष्य के हृदय में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को पुष्ट करती है। भगवान, भगवान की कथा और भक्तों की शरणागति कभी निष्फल नहीं होती। कथा में मुख्य यजमान भगवान भक्श सिंह, आशा सिंह तथा गोसाईगंज विधायक अभय सिंह सहित क्षेत्र के हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के दौरान पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत रहा।

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