उत्तर प्रदेश
कुर्बानी का हकीकी फलसफा, गलतफहमियां और इस्लामी नजरिया : मोहम्मद सैफ साबरी

कुर्बानी का हकीकी फलसफा, गलतफहमियां और इस्लामी नजरिया : मोहम्मद सैफ साबरी
उत्तर प्रदेश / लखनऊ
आज के दौर में बकरीद पर दी जाने वाली कुर्बानी को लेकर समाज में तरह-तरह की गलतफहमियां पाई जाती हैं। कोई इसे महज एक बेजुबान पर जुल्म करार देता है, तो किसी की राय होती है कि जानवर की गर्दन काटने के बजाय वह रकम सीधे किसी गरीब को बतौर-ए-सदका दे दी जाए। ऐसे में इस्लाम के हकीकी फलसफे और कुर्बानी की रूह को संजीदगी से समझना बेहद जरूरी है।
आमतौर पर बलि का तसव्वुर किसी माबूद या देवी-देवता के गुस्से को शांत करने या अपनी मन्नतें पूरी कराने के नजराने के तौर पर किया जाता है। इसके बरअक्स, इस्लाम का नजरिया बिल्कुल जुदा है। बारगाह-ए-इलाही में किसी के लहू की कोई कीमत नहीं होती।
कुरान पाक में साफ तौर पर इरशाद है कि अल्लाह तक न तो गोश्त पहुंचता है और न ही खून, बल्कि उस तक बंदे की साफ नीयत और तकवा पहुंचती है। इसलिए यह कोई खूनी रस्म नहीं है, बल्कि इंसान के भीतर छुपे अहंकार, लालच, स्वार्थ और बुरी इच्छाओं को जब्ह करने का एक रूहानी प्रतीक है।
यह सवाल अक्सर सामने आता है कि आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों की मदद नकद रकम देकर भी तो मुमकिन है, फिर इस अमल की क्या जरूरत है? इस्लाम इस विषय पर एक निहायत ही अमली और हिकमत भरा रुख रखता है।
मजहब में हर इबादत का एक मखसूस वक्त और तरीका मुकर्रर है। जैसे रमजान के महीने में भूखा-प्यासा रहकर रोजा रखना ही बंदगी है, वहां माली मदद रोजे का बदल नहीं बन सकती। ठीक इसी तरह, जिल-हिज्जा के इन मुकद्दस दिनों में खुदा की राह में जानवर कुर्बान करना ही सबसे महबूब काम है।
इसके अलावा, यदि केवल धन तकसीम किया जाए, तो मुमकिन है कि गरीब शख्स अपनी दूसरी घरेलू जरूरतों या कर्जों के बोझ तले दबकर पौष्टिक गिला भोजन से महरुम रह जाए। कुर्बानी यह यकीनी बनाती है कि साल में कम से कम एक मर्तबा समाज के सबसे मुफ्लिस लोग भी बिना हाथ फैलाए, पूरे आत्मसम्मान के साथ उम्दा तआम का लुत्फ उठा सकें। साथ ही, इस मुबारक मौके पर होने वाली तिजारत से छोटे किसानों और चरवाहों की आजीविका चलती है, जो दौलत के गर्दिश का एक अजीम जरिया है।
साहिब-ए-हैसियत मुसलमानों पर इसे एक जरूरी फरीजा माना गया है, जिसके पीछे कई गहरे पहलू पोशीदा हैं।
यह इबादत पैगंबर हजरत इब्राहिम के उस बेमिसाल जज्बे की याद ताजा करती है, जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपने अजीज बेटे तक को न्योछावर करने से गुरेज नहीं किया था। यह सबक सिखाता है कि हक के लिए इंसान को अपनी सबसे प्यारी शय भी छोड़ने को तैयार रहना चाहिए।
कुर्बानी के जानवर पर तीन हिस्से करने का हुक्म है। एक हिस्सा गरीबों के लिए, दूसरा रिश्तेदारों के लिए और तीसरा खुद के परिवार के लिए। यह व्यवस्था समाजी रवाबित को मजबूत करती है और ऊंच-नीच की खाई को पाटती है। जहां तक जीवों की बात है, इस्लाम बिला-वजह किसी परिंदे को भी सताने की मुखालफत करता है। इंसानी जरूरत के लिए जो हलाल तरीका तय है, उसमें पशु को कम से कम तकलीफ दी जाती है और हर कदम पर अल्लाह पाक का शुक्र अदा किया जाता है।
अल-किस्सा, यह रिवायत महज एक दिखावा नहीं है। यह खुलूस-ए-दिल, खिदमत-ए-खल्क और मुकम्मल समर्पण का रूप है, जो इंसान को खुदगर्जी के अंधेरे से निकालकर हमदर्दी के उजाले की तरफ ले जाती है।




