Welcome to Avadh Bhaskar   Click to listen highlighted text! Welcome to Avadh Bhaskar
अयोध्याउत्तर प्रदेश

धर्म के नाम पर आडंबर पर अयोध्या से महर्षि एकनाथ महाराज का बड़ा प्रहार

 धर्म के नाम पर आडंबर पर अयोध्या से महर्षि एकनाथ महाराज का बड़ा प्रहार
अयोध्या धाम
 गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर तपस्वी छावनी पीठाधीश्वर जगतगुरु परमहंस आचार्य के उत्तराधिकारी महर्षि महंत एकनाथ महाराज ने धर्म और आध्यात्मिकता के नाम पर बढ़ रहे आडंबर, पाखंड और दिखावे पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में भगवा वस्त्र, बड़ी दाढ़ी, चोटी, आलीशान आश्रम और भौतिक वैभव को ही गुरु की पहचान मान लिया गया है, जबकि यह सनातन परंपरा के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
महर्षि एकनाथ महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं धन, वैभव और मोह-माया के पीछे भाग रहा हो, वह समाज और मानवता का कल्याण कभी नहीं कर सकता। ऐसे मायावी और स्वार्थी लोग धर्म का उपयोग साधना के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रसिद्धि और संपत्ति बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। श्रद्धालुओं को ऐसे तथाकथित गुरुओं से सावधान रहने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में गुरु को ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम माना गया है। स्वयं भगवान श्रीराम ने भी गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र से शिक्षा ग्रहण कर यह संदेश दिया कि बिना योग्य गुरु के ज्ञान और जीवन की पूर्णता संभव नहीं है। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल चरण वंदन का पर्व नहीं, बल्कि अपने जीवन के लिए योग्य मार्गदर्शक चुनने का भी अवसर है।
महर्षि ने कहा कि सच्चा गुरु वह नहीं जो केवल कान में मंत्र फूंक दे, बल्कि वह है जो शिष्य के जीवन में ज्ञान, संस्कार और सत्य का प्रकाश भर दे। गुरु की वाणी तभी सार्थक होती है जब शिष्य उसे अपने आचरण में उतारे। केवल दर्शन, चरण स्पर्श या नाममात्र की दीक्षा से जीवन नहीं बदलता, बल्कि गुरु के बताए मार्ग पर चलने से वास्तविक परिवर्तन आता है।
उन्होंने गुरुकुल परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन काल में वर्षों तक अध्ययन, अनुशासन और साधना के बाद ही गुरु शिष्य को दीक्षा देते थे। पहले ज्ञान दिया जाता था, फिर मंत्र। आज इसके विपरीत केवल दीक्षा और दिखावे की होड़ ने आध्यात्मिकता की गरिमा को क्षति पहुंचाई है।
महर्षि एकनाथ महाराज ने कहा कि गुरु का मूल्य उसके वस्त्र, विशाल आश्रम, लोकप्रियता या आर्थिक संपन्नता से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, पवित्र चरित्र, निष्काम सेवा और शिष्य के प्रति समर्पण से होता है। जो गुरु शिष्य के दुख-सुख में साथ खड़ा हो, उसे धर्म, सत्य और आत्मबोध का मार्ग दिखाए, वही सच्चा गुरु कहलाने योग्य है।
उन्होंने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे बाहरी आडंबर से प्रभावित होने के बजाय विवेक, ज्ञान और चरित्र के आधार पर ही गुरु का चयन करें। क्योंकि सच्चा गुरु स्वयं की पूजा नहीं कराता, बल्कि शिष्य को ही स्वयं पूजन योग्य बना देता है l

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!